1. बिहार की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति

बिहार में फिलहाल में एनडीए की सरकार है जिसके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं. बिहार एनडीए में भारतीय जनता पार्टी, जनता दल यू और लोक जनशक्ति पार्टी शामिल है. मौजूदा सरकार में डिप्टी सीएम का पद भाजपा के सुशील कुमार मोदी के पास है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने ऐलान कर दिया है कि 2020 में होने वाले विधानसभा चुनाव में एक बार फिर नीतीश कुमार ही सीएम कैंडिडेट होंगे. ऐसे में यह तय हो गया है कि एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगा.

एनडीए के सामने एक बिखरा हुआ महागठबंधन यानी यूपीए है जिसमें सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल है. इस महागठबंधन में कांग्रेस, रालोसपा, हम सेकुलर और वीआईपी है. राजद की ओर से तेजस्वी यादव का सीएम उम्मीदवार होना तय है लेकिन ंसंपूर्ण महागठबंधन की ओर से इस बार पर कोई सर्वसम्मति दिखाई नहीं देती. संभव है कि चुनाव पूर्व राजद तेजस्वी यादव के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश करती हुई दिखाई दे.

बिहार में माले, जनाधिकार पार्टी और बसपा जैसी पार्टियां भी कई सीटों पर राजनीतिक समीकरणों को इधर उधर करने की ताकत रखती हैं. इनमें एक नया नाम एआईएमआईएम का भी जुड़ गया है.

  1. बात बिहार सरकार की

बात करें बिहार की नीतीश सरकार की तो इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार में दिख रहा विकास, जगमगाती बिजली, बेहतरीन सड़कें, दुरुस्त कानून व्यवस्था, स्कूल भवन, कॉलेज भवन ये सब उनकी उपलब्धियां हैं, जबकि बिहार में बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ता पलायन, नाम मात्र का भी निवेश होना और नियोजित शिक्षकों की वजह से शिक्षा में बदहाली सरकार की विफलताएं हैं. नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में सरकारी अस्पतालों की बेहतरी के लिए काम किया लेकिन बाद के दिनों में अस्पतालों की स्थिति बिगड़ती गई. चमकी बुखार में सैकड़ों बच्चों की मौत से नीतीश सरकार की साख का धक्का लगा. मैट्रिक और इंटर टॉपर घोटाले की वजह से भी सरकार की छवि खराब हुई.

  1. बिहार सरकार के सबसे कामयाब और नाकामयाब मंत्री

नीतीश कुमार की अपनी राजनीतिक शैली है कि राज्य सरकार के किसी भी मंत्री को उनके आगे अपनी अलग छवि बनाने की कोई कोशिश नहीं होनी चाहिए. हर अच्छे काम का क्रेडिट सीधे सरकार को सीएम को जाता है, ऐसे में किसी भी विभागीय काम को मद्देनजर रखते हुए कोई भी मीडिया हाउस किसी भी मंत्री को कामयाब नहीं बता सकता है लेकिन हाल के दिनों में सबसे ज्यादा फजीहत झेलने वाले मंत्री का नाम मंगल पांडेय है जो भाजपा कोटे से राज्य से स्वास्थ्य मंत्री हैं.

  1. घोषणा पत्र और जमीनी हकीकत

रोजगार के अवसर बढ़ाने और आर्थिक हल युवाओं को बल जदयू के घोषणा पत्र का पहला वाक्य था, इस पर नीतीश सरकार कुछ भी ठोस नहीं कर सकी. पलायन और बेरोजगारी पर सरकार कुछ नहीं कर सकी.

जदयू ने पिछले विधानसभा चुनाव में सात निश्चय को अपना आधार बनाया था, जिस पर सरकार बुरी तरह से विफल दिखाई देती है. सात निश्चय विकास की बजाय भ्रष्टाचार का पेड़ बन गया. आम जनता सात निश्चय की अफसलता को लेकर सरकार पर काफी आक्रोशित दिखती है लेकिन स्थानीय निकाय के जनप्रतिनिधियों के लिए ये सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन चुका है. स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना का हाल भी बेहद खराब है. हर घर नल का जल का नाम लेते ही लोग भड़क उठते हैं.

20 से 25 साल तक के युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की बात जदयू ने की थी, किसी को आज तक भत्ता नसीब नहीं हुआ. सभी कॉलेजों को वाई फाई बनाने की बात हुई थी जो आज तक नहीं हुई. हर जिले में रोजगार केंद्र खोलने और विदेशी भाषा शिक्षा करने की बात जदयू के घोषणा पत्र में थी, इसका भी अता पता नहीं चल रहा है.

  1. भारतीय जनता पार्टी का घोषणा पत्र

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू ने अकेले अकेले चुनाव लड़ा था. भाजपा के घोषणा पत्र में यह कहा गया था कि उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए 500 करोड़ का वेंचर कैपिटल बनाया जाएगा. 12वीं में अच्छा प्रदर्शन करने पर लैपटॉप और लड़कियों को स्कूटी दी जाएगी. 3 प्रतिशत सालाना ब्याज पर शिक्षा ऋण दिया जाएगा. हर शहर में ऑडिटोरियम और स्टेडियम बनाए जाएंगे. रोजगार के अवसर पैदा करने में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी. हर शहर में बाजार का निर्माण कर दुकानें बना कर बेरोजगार युवाओं को दी जाएगी. ग्रामीण क्षेत्रों तक ऑप्टिकल फाइबर पहुंचाया जाएगा.

भाजपा के घोषणा पत्र के किसी भी हिस्से पर अब तक कोई काम हुआ दिखाई नहीं पड़ता. हालांकि बिहार की राजनीति की हकीकत यह भी है कि घोषणा पत्र में कही गई बातें तो वोटरों को प्रभावित कर पाती हैं और नहीं ये वोटरों के लिए कौतूहल या जिज्ञासा का विषय होता है. राजनीतक गपशप में भी  घोषणा पत्र पर किसी भी प्रकार की कोई चर्चा नहीं होती. इसे एक औपचारिकता से ज्यादा कुछ भी नहीं समझा जाता है. बिहार की राजनीति में प्रधान गुण जातीय समीकरण है, वहीं से सभी चीजें प्रभावित होती है.

  1. आम लोगों का मिजाज

मोटे तौर पर देखें तो बिहार की वर्तमान नीतीश सरकार जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है. विरोधी तो विरोधी भाजपा और संघ के कट्टर समर्थक और कैडर भी नीतीश कुमार के खिलाफ विषवमन कर रहा है. ऐसे में नीतीश कुमार के लिए अगला चुनाव काफी चुनौतीपूर्ण है. उपर से तुर्रा यह कि बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक बिहारी अपने घरों को लौट आएं हैं और रोजगार का सवाल उन्हें परेशान किए जा रहा है. मुख्य विपक्षी दल राजद ने श्रमिकों के मुद्दे को हाईजैक कर लिया है. वैसे सत्ताधारी दल बार बार इस बात को जनता के बीच रख रहा है कि बिहार और बिहारियों की ऐसी दुर्दशा के लिए राजद का 15 साल का कुशासन ही जिम्मेदार है.

  1. भाजपा अकेले लडे तो क्या होगा

निश्चित तौर पर बिहार में जनाधार के मामले में भाजपा अकेले सभी राजनीतिक दलों पर भारी है लेकिन उसके नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ भी भाजपा कैडर लगातार बोल रहे हैं. ऐसी स्थिति में गिरिराज सिंह एक सशक्त विकल्प हो सकते हैं. बिहार की राजनीति में गिरिराज सिंह के स्वजातीय भूमिहारों के साथ सवर्ण मतदाताओं का रुझान गिरिराज सिंह की ओर दिखाइ देता है. गिरिराज सिंह की हिंदुत्ववादी छवि भी उन्हें भाजपा और संघ के कैडरों के नजदीक ले जाता है. नंदकिशोर यादव जैसे यादव नेता यादवों में लालू प्रसाद यादव के आसपास भी कही नहीं टिकते. रविशंकर प्रसाद की स्वीकार्यता आम मतदाताओं में बतौर सीएम नहीं है, हां कायस्थ समाज में वो लोकप्रिय नजर आते हैं लेकिन रविशंकर प्रसाद हो हो, कायस्थ समाज मूल रुप से भाजपा का मूल कैडर है. वो प्रत्याशी नहीं बल्कि सीधे कमल का निशान देखता है.

  1. महागठबंधन का हाल

महागठबंधन का चेहरा बिहार में स्पष्ट नहीं है. राजद के पास मुस्लिम और यादवों का वोट एकमुश्त मौजूद है. इसमें कोई भी बिखराव नजर नहीं आता लेकिन ये वोटर कुल मिलाकर 30 प्रतिशत के आसपास होते हैं. ये एनडीए को टक्कर तो दे सकते हैं लेकिन जीत नहीं. राजद को जीत के लिए 10 प्रतिशत अलग से वोटों की जरुरत होगी. प्रवासी मजदूरों का राज्य और केंद्र सरकार के प्रति आक्रोश राजद के लिए संजीवनी का काम करता दिखाई दे रहा है.

विगत लोकसभा चुनाव में राजद ने इसी 10 प्रतिशत वोटों के आसरे में उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतन राम मांझी को साथ मिलाया लेकिन उनका वोट ट्रांसफर होने की बजाय एनडीए के साथ चल पड़ा क्योंकि उस वक्त मोदी लहर थी. आम तौर पर ओबीसी वोटरों में यादवों के साथ कुशवाहा वोटों का सामंजस्य नहीं हो पाता है और नहीं मल्लाह वोटरों का.

राजद के साथ कांग्रेस जरुर है लेकिन कांग्रेस का वोट राजद में ट्रांसफर होना बड़ी मुश्किल होती है. राजद का वोटर कांग्रेस के साथ हो जाता है लेकिन जिस सीट पर कांग्रेस का उम्मीदवार नहीं होता वहां उनके वोटर एनडीए के साथ हो जाते हैं. वैसे बिहार में कांग्रेस का जनाधार शून्य ही है पर ब्राह्मणों का कुछ वोट उनके साथ आज भी जुड़ा हुआ है और ब्राह्मण वोटर राजद के साथ जाने में असहज महसूस करता है.

  1. तीसरे मोरचे की आहट भी तेज

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद राजद अब उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी के साथ जाने के मूड में नहीं है. सारा दारोमदार अब सोनिया गांधी के अगले कदम पर होगा. उपेंद्र कुशवाहा फिलहाल सोनिया गांधी के निर्देश का इंतजार कर रहे हैं. संभव है कि बिहार में एक तीसरा मोरचा भी सामने नजर जाए जिसमें कांग्रेस, रालोसपा, वीआईपी और पप्पू यादव की जनाधिकार पार्टी भी सामने हो. इसमें उपेंद्र कुशवाहा भी सीएम फेस हो सकते हैं. इस तीसरे मोरचे को हर विधानसभा क्षेत्र में 15 से 20 हजार वोट तो हासिल हो सकते हैं लेकिन सीटें निकालनी बेहद मुश्किल होगी. वहीं राजद, बसपा और माले के साथ जाने की फिराक में दिखाई दे रहा है.

  1. युवाओं और महिलाओं का मूड

शराबबंदी और लड़कियों के लिए साइकिल और सैनिटरी पैड जैसी योजनाओं की वजह से महिलाओं का वोट एनडीए की ओर दिखाई पड़ता है तो युवा वर्ग बेरोजगारी की वजह से एनडीए के खिलाफ वोट कर सकता है. वहीं शराब पीने वालां का भी एक वर्ग है जो भाजपा जदयू के खिलाफ वोट करेगा.

  1. एनडीए की ओर कैसे लौटेंगे बिदके वोटर

जदयू अगर भाजपा के नेतृत्व को स्वीकार कर ले और गिरिराज सिंह जैसे नेता को सीएम उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए तो वोटर एक बार फिर से एनडीए को चुन सकते हैं. वैसे संभावना यह भी है कि बचे हुए दिनां में रोजगार सृजन को लेकर राज्य सरकार की ओर से कुछ ठोस कदम उठते हुए नजर आए तो बात बन सकती है.

  1. यूपीए की ओर कैसे लौटेंगे वोटर

यूपीए यानी राजद के लिए संभावनाएं काफी विशाल है लेकिन उन्हें भी एम वाई यानी मुस्लिम यादव से बाहर निकलना पड़ेगा. राजद इसके लिए कोशिश करता हुआ भी दिखाई दे रहा है. ब्राह्मण मनोज झा और भूमिहार अमरेंद्र सिंह को राज्यसभा भेजकर राजद ने बड़ा मैसेज दिया है. अगर राजद और कांग्रेस का गठबंधन होता है और कांग्रेस की ओर से किसी सवर्ण को डिप्टी सीएम का उम्मीदवार बनाया जाता है तो लालटेन की लौ तेज हो सकती है. बाकी चीजें स्थानीय उम्मीदवार की जाति पर भी निर्भर करेगा.

  1. जातीय समीकरण

बात करें जातीय समीकरणों की तो जो सबसे ज्यादा जरुरी है तो पक्के तौर पर यादव और मुस्लिम राजद के साथ हैं जबकि सवर्ण, कुर्मी, पासवानों का 75 प्रतिशत वर्ग, वैश्य, अतिपिछड़ों का बड़ा हिस्सा एनडीए के साथ है. कुशवाहा वोटरों का बड़ा वर्ग उपेंद्र कुशवाहा के साथ और युवा मल्लाह जातियों का वोट मुकेश सहनी के साथ नजर रहा है. सीमांचल में औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम भी राजद को नुकसान पहुंचा सकती है.

कुल मिलाकर कहानी अभी भी स्पष्ट नहीं है. अगर बसपा का राजद के साथ गठबंधन होता है तो चमार वोटर भी राजद के साथ मजबूती से खड़ा हो जाएगा. राजद और एनडीए के बीच जहां जबर्दस्त टक्कर दिखाई दे रहा है तो एंटी इंकंबैसी फैक्टर राजद के पक्ष में दिखाई दे रहा है. तीसरा मोरचा अधिकांश सीटों पर वोटकटवा की भूमिका निभाएगा. ये मोरचा दोनों प्रमुख गठबंधनों के उम्मीदवारों के वोट काट सकता है.

12. चिराग बढ़ा रहे मुसीबत एनडीए की

एनडीए के लिए नई मुसीबत लोजपा प्रमुख चिराग पासवान बनते जा रहे हैं. चिराग लगातार नीतीश कुमार के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं. पहले तो इसे गीदड़ भभकी के तौर पर लिया जा रहा था लेकिन जैसे ही गठबंधन को एकजुट बताने वाले लोजपा जिलाध्यक्ष को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया, वैसे ही साफ हो गया कि चिराग पासवान कोई बड़ा एक्शन ले सकते हैं. चिराग का क्या एक्शन क्या होगा, इस पर फिलहाल कुछ भी नहीं कहा जा सकता लेकिन इस फैसले का प्रभाव चुनावी नतीजों पर पड़ेगा, ये तय है.