ओवैसी ने पिछले कई राज्यों के चुनाव में कांग्रेस का वोट काटकर उसे अच्छा खासा नुकसान पहुंचा दिया था. खास तौर पर बिहार विधानसभा चुनाव में विधानसभा की 05 सीटें जीतकर और दो दर्जन सीटों पर हवा बिगाड़ कर ओवैसी ने भाजपा जदयू की सरकार बनाने में मदद की और राजद कांग्रेस गठबंधन का सपना हवा हो गया लेकिन इस बार कांग्रेस ने बिना कहे पूछे ऐसी शातिराना चाल चली है कि असम से लेकर बंगाल में ओवैसी की हवा गायब हो गई है.

असम, पश्चिम बंगाल समेत देश के 05 प्रदेशों में चुनावों का ऐलान हो गया है. बिहार विधानसभा चुनाव में राजद और कांग्रेस के गठबंधन को हरवाने के बाद असम, केरल और पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक आबादी देखते हुए ओवैसी को काफी उम्मीदें थी लेकिन कांग्रेस ने ऐसी चाल चली है कि ओवैसी के होश उड़े हुए हैं.

बंगाल में लगभग 32 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. ऐसे में ओवेसी फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के साथ चुनाव लड़ना चाहते थें. फुरफुरा शरीफ का बंगाल की 100 विधानसभा सीटों पर प्रभाव माना जाता था लेकिन कांग्रेस ने ऐन वक्त पर ओवैसी की उम्मीदों पर झाड़ू फेरते हुए पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के साथ गठबंधन किया और ओवैसी मुंह ताकते रह गए.

वहीं असम में कांग्रेस ने मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन कर ओवैसी की रणनीति की हवा निकाल कर रख दी. हालांकि मौलाना बदरुद्दीन अजमल का असम के मुसलमानों पर प्रभाव देखते हुए ओवैसी ने पहले ही कह दिया था कि वो असम विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे.

बात करें केरल की तो वहां के मुसलमानों पर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का काफी प्रभाव है और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का भी कांग्रेस के साथ गठबंधन हो गया है. अब ओवैसी करें भी तो क्या करें.

तमिलनाडु मंे मुस्लिम वोटर करीब 06 फीसदी हैं. पिछली बार ओवैसी ने यहां की दो सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थें, दोनों की जमानत जब्त हो गई थी. इस बार भी यहां ओवैसी ने चुनाव लड़ने और उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है लेकिन यहां भी कांग्रेस डीएमके गठबंधन के आगे ओवैसी को मजबूत उम्मीदवार मिलने की चुनौती है.